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राम और मारीच का युद्ध


( दृश्य विश्वामित्र का यज्ञ में लीन हैं, राम और लक्ष्मण धनुष तान कर बैठे हैं ) 

विश्वामित्र : बेटा राम और लक्ष्मण सावधान हो जाओ । दुष्ट मारीच पवन की तरह आ रहा है । {मारीच का भागकर आना और उधम मचाना}

मारीच : एक नारी को मारकर, उछल रहा रण बीच ।       

              बचकर जायेगा कहां, आ पहुंचा मारीच ।  

राम  : क्यों जादा बक-बक करे, कर जबान को बन्द । 

           मां तो तीर चला चुकी, अब आया फरजन्द ।

मारीच : - रे शठ बालक धनुष चढ़ाई आवा हम सन करन लड़ाई । 

                देखहुं रूप अति सुन्दर तोरा, दयावन्त मन मा है मोरा ।

राम  : अरे दुष्ट क्या कहेहू सुरारी, नहिं जाने हम हैं धनुधारी । 

           अब शठ छोड़ जीवन की आशा, बहुत दियो मुनियन को त्रासा ।

मारीच : अरे मूढ़ बालक अभिमानी, मारि ताडिका अहमति ठानी 

              बालक देखि बघहुं नहि तोही, क्या सर चाप दिखावे मोही ।

राम  : जैसे हम बालक दोउ आई, देख तुझे अभी परत दिखाई । 

           अति तीक्ष्ण हैं बाण हमारे, लागत हरहिं प्राण तुम्हारे ।

मारीच : एक औरत को मारकर इतना क्यों उछलता है ।

राम  : वह तो अपनी करनी का फल पा चुकी है । 

मारीच : और तू भी अपनी मां के पास जीवित जा चुका है ? 

राम : अरे ! क्यों मुंह फाड़-फाड़कर बातें बनाता है और व्यर्थ ही में मुझे गुस्सा दिलाता है । बस ! अब मरने के लिए तैयार हो जा । 

( राम और मारीच का युद्ध होता है और वो भाग जाता है तभी सुबाहु आता है ) 

सुबाहु : बस ! ओ नादान अब जवान की लपलपाई को छोड़ दे । वह भाग गया तो क्या हुआ मैं जो हूं । 

लक्ष्मण : अगर तुझे भी जिंदगी की चाह है तो दोनों हाथ जोड़ दे । 

सुबाहु : चुप रहो नादान । 

लक्ष्मण : पीछे हट बेईमान । 

सुबाहु : तेरे सिर पे मौत सवार है । 

लक्ष्मण : तू खुद मौत का तलबगार है । 

सुबाह : अरे तेरे मुंह से तो कच्चे दूध की बास बा रही है ।

लक्ष्मण : और तेरी मौत तुझे बुला रही है ।

सुबाह : अरे छोकरे तेरे तो अभी दूध के दांत भी नहीं टूटे । 

लक्ष्मण : हाँ मेरे नहीं टूटे किन्तु तेरे अवश्य टूटेंगे । 

( दोनों का युद्ध होता है  और सुबाहु का मारा जाता है ) 

विश्वामित्र : शाबास बेटा ! राक्षसों का खूब काम तमाम किया । 

राम  : गुरु जी यह सब आपके आशीर्वाद का फल है । 

विश्वामित्र : नहीं-नहीं बेटा राम, तुम सूर्यवंश के दीपक हो । चाद में दाग है किंतु तुम बेदाग हो । 

राम  : अच्छा गुरु जी अब हमारे लिए क्या आज्ञा है ? 

विश्वामित्र : बेटा अब आराम करो । {विश्वामित्र का यज्ञ करते है तथा राम और लक्ष्मण का यज्ञ की रक्षा करते  है} 

( दूत का वन प्रवेश ) 

दूत : जनक पुर से सूर्य निकलने से पहले चला था और अब सुबह से शाम होने को आ गई है । बहुत थक चुका हूं परन्तु अभी तक मुनि विश्वामित्र के स्थान का पता न मिला। सुना है कि वे इसी जंगल में रहते हैं । अब क्या करूं, कहां जाऊं ? कोई आता-जाता भी तो नहीं दिखाई देता ? खैर अब इस ओर जाता हूं शायद कहीं पता लग जाय । 

( कुछ दूर से विश्वामित्र जी और राम लक्ष्मण के साथ दिखाई देना ) 

दूत : क्या मुनि विश्वामित्र जी का यही स्थान है ? 

विश्वामित्र : उनसे क्या काम है ? 

दूत : उनके नाम एक पत्र है । 

विश्वामित्र : हां मेरा ही नाम विश्वामित्र है । 

दूत : {पत्र को देते हुए} लीजिए मुनिनाथ ! आपके नाम का यह पत्र है । अब मुझे आज्ञा दीजिए क्योंकि मुझे और भी जगह जाना है । 

राम : गुरु जी यह पत्र कहां से आया है और इसमें क्या लिखा है । 

विश्वामित्र : बेटा ! तुम स्वयं पढ़कर मुझे भी सुना दो ।

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